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जैन धर्म एक सत्य-अहिंसा स्वरुप शाश्वत परम पवित्र आध्यात्मिक परिणत धर्म है | सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्र ये तीन जैन धर्म के मूलाधार है | इन तीनों की एकता ही मोक्ष मार्ग का रास्ता दिखाती है | सत्य और परिपूर्ण अहिंसा रूप आचरण ही इस धर्म का मूलान्त है. भगवान सर्वज्ञ, वीतरागी और हितोपदेशी है | संसार का प्रत्येक प्राणी अपने भाग्य का स्वयं विधाता है और अपने अच्छे बुरे कर्मो का फल स्वयं ही भोगता है | संसार का प्रत्येक पदार्थ प्रकृति द्वारा सृजित एवं विसर्जित है और इसका कोई कर्ता-हर्ता नही है | More..

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मंडार में श्री शीतलनाथजी के मंदिर में श्री सुमतिनाथजी की देहरी के भूमिपूजन खननविधान, शिलान्यास एवं मूलनायक श्री सुमतिनाथजी व पाशर्वनाथ प्रभु की दोनों प्रतिमाओं प्रतिष्ठा का लाभ |

मंडार में धरणेन्द्र पदमावती नागदेवता मंदिर की ध्वजा का लाभ |

श्री मंडार से शंखेश्वर-शत्रुंजय महातीर्थ का १४०० आराधकों का भव्य छ :री पालक संघ | More..